आज के बदलते परिदृश्य में

 

आज क्या हमारे सोचने के तरीके में बदलाव आया.

आज जहाँ एक ओर हम नयी चीजों को जानने समझने की दौड़ में  लगे हुए है तो वही दूसरी ओर हम खुद को पीछे छोड़ते जा रहे हैं.

आज हम सब  के लिए 'चलती का नाम जिंदगी'  कुछ अलग ही हो गया है.

इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि भले ही बचपन में हमने कुछ सपने देखे हो कि हम ये बनेगे ,हम वो बनेगे किन्तु आज हम एक दूसरी ही दृष्टि से दुनिया को देख रहे हैं जहाँ केवल हमें पैसे और  चमक दिखाई दे रही है.

लेकिन इस चमक भरी दुनिया में जाने से पहले हम सब को  ये जरूर सोचना चाहिए कि 'चांद पर भी  ग्रहण लगता है' फिर हम क्या चीज है.

आज हमें अपने उन सपनों को पूरा करने की जरूरत है जो हमें सच में खुशी और चैन देता हो क्योंकि दिखावे कि जिंदगी दो दिन ही अच्छी लगती है 'दोस्तों दूर के ढोल बड़े सुहाने लगते' हैं लेकिन जब वो हमारे पास बजाए जाते हैं तो हमारे कान में दर्द होने लगता है और हमें वो अच्छा नहीं लगता.

Comments

Poornima said…
Absolutely right 👍👍👍