हम सब की एक मंजिल जरूर है जहाँ पर हमें पहुंचने के लिए संघर्ष हद से ज्यादा करना पड़ता है ∣ क ई बार तो हालात ये हो जाते हैं कि हमें लगता है कि हम इसका मुकाबला कैसे कर सकते हैं ? अपने दृढ़ निश्चय के बल पर हम सब उसे जीतने की कोशिश लगातार करते हैं ∣ और हर हाल में चलते जाते हैं उसे पाने की ललक में फिर चाहे शरीर के घाव हम से आराम की मौहलत कितनी मांगे हमारे पैर भला कहाँ रूकते हैं, जिंदगी जीना एक तरह की इसी को तो कहते हैं ∣ इस कोशिश में क ई बार कुचली जाती है ख्वाहिशें ,क ई काटों पर भी चलना पड़ता है ∣ और आगे चलते जाना ही जैसे राह बन जाती है, हमारी क ई अच्छी -बुरी चीजों को छोड़कर आगे हम बढ़ते हैं ∣ इस मंजिल को पाने की मंशा के लिए क ई बार कूदना पड़ता है अंगारे पर फिर चाहे हाथ जले या पांव फर्क जैसे हमें नहीं पड़ता है ∣ रूकते- रूकते चलना सीखते हैं हम पर फिर चलते -चलते रूकना जैसे खुद से भूल ही जाया करते हैं ∣ ऐसे ही मिल जाती है क्या मंजिल ,इसे पाने के लिए क ई बार हम खुद को लहुलुहान भी करते है ∣ रक्त की बूंद भी ...
वो बात जो जरूरी है