इसे हमारी विडम्बना कहूं या सामाजिक बुराई लेकिन सच तो ये है कि हम चाहे कितना भी कह दे कि हम बदल गए हैं पर वास्तव में हम जाति के मामले में आज भी उतने ही अमानवीय है जितने की पहले थे। जहां पर हम जाति के मुताबिक ही सारे काम करते हैं। जहां छूआछूत उसी हद से की जाती है जैसे की पहले की जाती थी। फर्क इतना सा है कि अपने आप को सभ्य कहने वाले इसे चोरी छिपे करते हैं। जबकि खुद को धर्म का सच्चा रक्षक बताने वाले इसे सबके सामने करते हैं। जिनके लिए एक इंसान की जाति ही सबकुछ है । जो जाति के आधार पर अपने आप को श्रेष्ठ दूसरों को नीचा मनाते हैं। केवल इसलिए की वो उच्च वर्ग में पैदा हुए हैं। भले ही उनके पास को कोई गुण हों या नहीं।
वो बात जो जरूरी है