ये कैसा आरंभ है जहाँ जलने से पहले बुझता दिया है चारों तरफ हो रही है परेशानी ही परेशानी छायी जहाँ मानव अपने ही बनाएं नियम में कैद हो गया है, कही कोई देश महामारी से है पीड़ित तो कही धुआँ ही धुंआ है कही भरा हुआ है पानी बाढ़ का, तो आज हमारा व्यवहार भी किस तरह से बदला है फूल तो हर कोई तोड़ ले जाता है बागों से किन्तु पेड़ को काटने से किस ने रोका है.
वो बात जो जरूरी है