दोस्ती के आगे कुछ भी नहीं फिर चाहे प्रेम ही क्यों न हो इस मूवी में दोस्ती की परिभाषा बताई गयी है जिसमें एक दोस्त अपनी शादी का आया रिश्ता अपने दोस्त के हाथों में दे देता है तो वहीं जब उसे मालूम चलता है ये मेरे दोस्त नबाब साहब की प्रेमिका है तब वो अपनी बेगम की शादी अपने दोस्त नबाब से करने की कोशिश करता है. लेकिन वो इस प्रयास में सफल नहीं होता . इसका सबसे अच्छा गाना जो दर्शकों को आकर्षित करता है जो इस तरह से है_ " चांद 🌙 सी मेरी मेहबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था, . हाँ तुम बिल्कुल वैसी हो जैसे मैंने सोचा था". कहीं कहीं ये मूवी पाठकों को सोचने के लिए मजबूर कर देती है कि किसके साथ सही न्याय होगा. और अंत में पाठकों की हर जिज्ञासा को खत्म करती है. गानों के बोल बहुत सही ढंग पेश किये है इसकी एडिटिंग, स्क्रिप्टिंग बहुत सही तरीके से की गयी है. चौदहवीं का चांद मूवी दोस्त की दोस्ती, और नबाब के शान शौकतों, प्यार के असली मायने ,को एक साथ जोड़ती है. वर्तमान समय में हम इ...
वो बात जो जरूरी है