बेटी ब्या ही जाती है घर की दीवारों से केवल नहीं ब्याही जाती है अपने स्वाभिमान से अपने सपनो से, बेटी ब्याही जाती है दहेज के उसूले से जो नहीं होने पर ब्याह दी जाती है अपने पिता की उम्र के लड़को से। एक लड़की की जिंदगी देखने में आज भी कितनी चमकदार लगती है । पर अफसोस वो केवल किसी दूसरे के घर जाना है इसी के लिए तैयार की जाती है। इसकी सारी ख्वाहिशें शादी की रस्मों के साथ खत्म हो जाती है। चाहे कितने भी अभिजात वर्ग की हो ये लड़की पर उसकी लंबाई तो उसके दहेज के कद से नापी जाती है। अफसोस आज 2023 के वक्त में भी जब दुनिया चांद पर बसने के सपने देख रही है तब भी उस बेटी का कद तो केवल उसके दहेज से नापी जाती बैठा है। कभी जलती है वो दहेज की कमी से, तो कभी दहेज की सारी मांग पूरी न होने से जो हो चाहे नवविवहिता या, या अभी ब्याही जाने वाली उसकी किस्मत तो केवल दहेज से शुरु उससे ही खत्म हो जाती है। इसी कड़ी में जब हम प्रेमचंद को पाते है तब निर्मला जैसी बहुत सी लड़की की कहानी हमारे चारों तरफ घुमते हुए नजर आती है। जहां आज भी दहेज की कमी के कारण अच्छे रिश्ते टूट जाते है। गल...
वो बात जो जरूरी है