क्या आज का युवा वास्तव में सोया हुआ है। जहां वो ये न हीं देख पा रहा है कि वो स्वयं ही दूसरें के जाल में फंस अपनी जिंदगी को कर रहा बेहाल है। जहां उसकी जिज्ञासों को खत्म करने की वजह उसे बेबुनियाद सी बातोंं के पीछे लगा दिया जा रहा है। शायद यहीं वजह है कि जब देश में कम पढ़े लिखे लोगों को फूलों की माला और पढ़े लिखें लोगों को पुलिस की मार मिलें तो इस पर ज्यादा आश्चर्य नहीं करना चाहिए। जिससे हम युवाओं का कोई मतलब ही नहीं है। बुरा तो केवल हमें तब लगता है। जब बात हमारी परीक्षा के रिजल्ट की हो। जब भाई बहन को गर्लफ्रेंड और ब्रायफ्रेंड समझ किसी से मार मिलें। तब बात सही और गलत की आ जाती है। तब हमें आस पास की परेशानी समझ आती है। तब भी हम केवल गाली राजनीति को ही देते है। किन्तु उसकी जड़ तक पहुंचने से आज भी हम डरते है। अफसोस उसे हम अपनी लाचारी बना ऐसे लोगों के सामने पेश करते है। जैसे हम युवा न होकर केवल लाचार इंसान है। शायद यहीं कारण है चुनाव में रोजगार भले गायब रहें किन्तु धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति जारी रहती है। जहां हम नायक फिल्म के हीरों की तरह करना तो बहुत कुछ चाहते है। पर...
वो बात जो जरूरी है