उपन्यास रवींद्र नाथ टैगोर इस उपन्यास की कहानी में एक गोरा नाम का युवक है जो कि शुरू से ही अपने आप को हिंदू समझता है जो नियम धर्म का बहुत पक्का है वो अपनी माँ आनंदमई के बनाये हुए भोजन को केवल इसलिए नहीं करता क्योंकि उसकी माँ आनंदमई कोई भी नियम धर्म नहीं मानती है वो अपने घर आयी कुम्हारन से किसी भी तरह की दूरी नहीं रखती यहाँ तक की वो कभी कभी उसके घर चाय तक पी आती है. जब गोरा के पिता की तबीयत अचानक खराब हो जाती है तब उसके पि ता ये चाहते हैं कि मेरे मरने से पहले ही गोरा को ये मालूम चले जिस हिन्दू समाज के लिए वो हमेशा दूसरों की बातों को अनदेखा करता है असल में वो उसका है ही नहीं . जब गोरा को उसके पिता के द्वारा मालूम चलता है कि वो आनंदमई का बेटा नहीं है तब वो बहुत टूट सा जाता है. वो परेश बाबू के पास जाता है जो कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं और गोरा कहता है कि मैं हिन्दू नहीं हूँ मैं अब इ...
वो बात जो जरूरी है