आज एक कविता को पढ़कर सच में ये लगा । कि आज भी चलों कुछ चीज सरकार की सेंसरशिप से बची हुई है । नहीं तो आज भी शासन की नजर हर पत्रकार हर लेखक पर पड़ी है ∣ न लिखने के दर्द से हर रोज गुजरते जो लोग,क्या सोचा तुमने आज भी कितने अपनी अभिव्यक्ति को देने के कारण सलाखों के पीछे आ जाते हैं ∣ केवल उनकी गलती इतनी होती है । कि वो कुछ लिखने की बगावत करते हैं ।
वो बात जो जरूरी है