ये कहां आ गए हैं हम जहां पेड़ों की छांव कहीं नहीं जंगल में आ बैठे है हम सबकुछ पाने की लालसा पेड़ पौधों सब खा गए हम। न बचा कुछ न रखा कुछ केवल आज का सोच हर चीज नष्ट करते चले हम। जो खायी थी कसम पेड़ों को सहेजने की उसे भूल सबकुछ उजाड़ कर खुश हुए हम। आज जब सवाल इनके संरक्षण का आया है तब इनका दोहन करने लगे हम आधुनिकीकरण के दौर में आंखें होकर भी अंधे हुए हम सबकुछ देखकर भी नजर अंदाज करने में लगे हम।
वो बात जो जरूरी है