किसी भी चीज़ की शुरुआत करना जितना मुश्किल होता है उसे कही ज्यादा मुश्किल उसे लगातार करते जाने में होता है जब आपके सामने अनेक तरह की परेशानी खड़ी हो जाती है और उस समय आपको अपने आप से ही प्रश्न करना पड़ता है? कि जिस काम को शुरू किया है उसे अंत तक ले जाने में क्या मैं कामयाब होगा की नहीं , कुछ इसके जबाब को खोजते - खोजते अपने काम में इस कदर से लग जाते हैं कि उन्हें न किसी दुनिया दारी की फ्रिक होती है और न खुद के स्वास्थ्य की इन दोनों में जो लोग संयम बना लेते हैं वो रेल की पटरी की तरह अपने काम को करने में लगे रहते हैं बिना इसके कि क ई ऐसी ट्रेन तो नहीं चल रही उनके ऊपर जिनसे उनके बहुत से गिले-शिकवे है वो फर्क हीन होकर अपने वजूद को खोजने निकल जाती है, इस पड़ाव पर पहुंचकर जितना हम अपनी जिंदगी को नहीं समझ पाते उतना वो हमें समझ लेती है और हम एक बंदिश रहित चिड़िया की तरह उड़ने लगते हैं जो काम कल तक उसके लिए " हाथ पर सरसों जमाने सा "है जिसका भावार्थ (असम्भव काम को सम्भव करना वो उस काम में हुनरमंद) हो जाते हैं ऐसा नहीं इस बीच उनके जीवन में कोई तकलीफ नहीं आती किन्तु वो प्रभाव...
वो बात जो जरूरी है