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Showing posts from June 17, 2020

ऐ वतन वतन मेरे आबाद रहे तू

एक ऐसी  जिदंगी जहाँ पर लोगों को ये नहीं मालूम कि वो  कब तक अपनों के साथ रहेंगे. आज वो जा तो रहे  अपने घर से वतन की सेवा करने लेकिन व़ो वापस  आएंगे भी यहाँ नहीं उनको ये नहीं मालूम फिर भी मन में एक नयी उमंग लिए वो घर से निकल रहे हैं इतने में एक फौजी की बेटी घर से निकलती है अपने पिता को रोकने....  (फौजी पिता के संग नन्ही बेटी के  संवाद) पिता -  बेटी में  चला भारत माता की सेवा करने चल फिर मिलता हूँ  तुझें से, बेटी- पापा अभी कल ही तो तुम आएं और आज चले देश की सेवा करने? पिता-  बेटी मैं फौजी हूँ  देश की सेवा करता हूँ हर दिन दुश्मन से लड़ता हूँ  यहीं तो मेरा काम है. "वहाँ खून किस मतबले का जिसमें उबाल नाम नहीं वहाँ खून किस काम का जो आवें देश के काम नहीं" समय बीता.............. ( कुछ समय बाद ही खबर आयी कि सीमा की रक्षा करते हुए दुश्मनों से लड़ते हुए वो चले बसे. बेटी दौड़ती हुई आयी और देखा जब पिता को सफेद कपड़े से ढके  हुए तो बोली - **जो सिर पर बांध कर चलते हैं कफ़न जिनकोे  पता नहीं घर जाएगें पैरों से या चार कंधों...