प्रकृति से प्रेम भले किस को न होगा। जब रहे मन अशांत बैठ जाओं खुली हवा के नीचे हो जाता है मन शांत। ये प्रकृति हम से कुछ नहीं मांगती, केवल कर दो उसका संरक्षण ये केवल उतने में ही संतुष्ट हो जाया करती। प्रकृति का सौंदर्य जब देखता है ,शख्स बारिश के मौसम पर तो हर किसी का जी केवल उसे दीदार करने की ओर ही बढ़ता जाता है। और लगता है निहारते रहो, उस प्रकृति को जहाँ उसके अलावा किसी के होने की जरूरत नहीं होती है। आखिर किसे नहीं पसंद आएगी, पेड़ के पत्तों की आवाज जब कोयल अपनी मधुर ध्वनि में शब्द गुन गुनाएगी । बड़ी ही तसल्ली होती है जब देखों हरे भरे पेड़ का झुंड और पर्वतों में चारों तरफ छाई हुई हरियाली ।जहाँ बैठे तो दोपहर से शाम हो जाएं पर लगे कि अभी तो किया है इसका दीदार और फिर चल दिया मुसाफिर अपने द्वार । प्रकृति के सौंदर्य पर करूँ हर मंहगी उन चीजों को न्यौछावर जिन्हें कुछ लोग द्वारा समझा जाता है बड़ा उपहार । पर अफ़सोस की बात है बरसात में जिस प्रकृति को निहारने जाते हम दूर दराज बरसात बीतते ही नहीं आती उसकी याद । न सागौन का पेड़ न जंगलों की हरियाली,...
वो बात जो जरूरी है