चुनाव का दिन, मतलब ऑफिस से छुट्टी का दिन। जिस दिन लोग सुकून की नींद ले पाते है। कुछ के लिए इस दिन अपने परिवार के साथ समय बीतना, तो किसी के लिए कहीं घूमने जाने का दिन होता है। जो उनको वोट देने से ज्यादा जरूरी लगता है। शायद यहीं कारण है लोकसभा चुनाव की तैयारी चाहे जितने जोर शोर से की गयी हो। किन्तु लोगों को इस तामझाम से अब ज्यादा कुछ मतलब नहीं रह गया है? जहां लोगों के लिए चुनाव से ज्यादा जरूरी कुछ और हो गया है। फिर भले क्यों न वो हर पांच साल में आते हो। लोगों को अब ज्यादा जरूरी अपना कुछ पर्सनल काम हो गया है। जहां उनकी सोच ये हो गयी है कि भला देश के लिए वोट देने से उनको क्या ही मिलेगा? जिनके लिए लोकतंत्र के महापर्व से ज्यादा जरूरी कुछ और हो गया है। दो चरण में हुयी वोटिंग में हुआ, मतदाताओं का प्रतिशत कम अब तक लोकसभा के लिए दो चरणों में वोटिंग हुयी है जिसमें मतदाताओं के प्रतिशत में कमी देखी गयी है। जो बहुत कुछ बताती है। सभी राजनीतिक पार्टियों संकेत देती है। कि अगर वो जनता के लिए गंभीर नहीं है। तो जनता से भी वो ये उम्मीद न करें। कि जनता उनके लिए...
वो बात जो जरूरी है