जब गिरो तुम : इंसान को भले अपना अच्छा पल याद न रहे लेकिन उसे वो इंसान और वो समय नहीं भूलता जिस पल उसे नीचे गिरने की कोशिश की गयी हो। भले ही उसका मतलब दूसरे को नीचा दिखाना न हो, ये सब झेल रहा इंसान अंदर से थोड़ा टूट जाता है। जहां बाकी लोग उस पर हंस रहे होते हैं। वहीं वो अंदर ही अंदर खुद को उस चीज के न आने पर कोस रहा होता है कि उसे ये चीज क्यों मालूम नहीं थी। ऐसे वक्त में उसके धैर्य और ज्ञान का असली परिचय होता है कि उसे वो चीज न आने का ग़म है या खेद। वो लोग जो इस अपमान को सम्मान में बदलने की कोशिश करते हैं वो लोग आगे निकल जाते हैं। जो लोग बस इस अपमान का बदला लेने की कोशिश करते हैं वो अपनी ही नजरों में गिर जाते हैं जो सिर्फ दूसरों पर उंगली उठाते है पर खुद पर कोई काम नहीं करते हैं। इसके बावजूद वो लोग " इसे फर्क नहीं पड़ता कि तुम क्यों गिरे फर्क इससे पड़ता है कि उसके बाद भी तुम कितनी तेजी से उठे"।
वो बात जो जरूरी है