आज जब हम सब खुद को बहुत आधुनिक कहते हैं लेकिन जब बात आती है पीरियड्स की तब या तो हम सार्वजनिक तौर पर उसका नाम लेने से बचते हैं या फिर हम उस शब्द को जितना हो सके कम ही इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। हद तो तब हो जाती है जब हमें इस बारे में कहने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है उस वक्त हम सबसे ज्यादा हिचकिचाते हैं केवल इसलिए कोई सुन न लें जैसे हम ये शब्द कहकर कोई अपराध कर रहे हो। जहां सैनिटरी पैड कागज में लपेटकर और एसिड जैसी चीजें खुलेआम बिक रही हो। जो आज दुनिया की आधी आबादी को सम्मान पूर्वक जीवन जीने का हक दे रही हो। हम माने या न माने पर सच्चाई यही है कि आज भी हम कुछ चीजों को लेकर उतने ही असहज हैं जितना की पहले थे जिसको लेकर हम बिल्कुल भी नहीं बदले हैं। उस चीज को लेकर हम वहीं खड़े है जहां पहले खड़े थे मैं मानती हूं कि आज परिवर्तन की लहर आयी है पर अफसोस वो परिवर्तन की लहर कुछ चीजों को टस से मस नहीं कर पायी है। आज जब ये सवाल आता है कि क्या पीरियड्स लीव दी जानी चाहिए? तब पीरियड्स लीव न दी जाएं इसका समर्थन करने की बड़ी वजह यही है कि हम चीज समाज में रहते हैं वो समाज पितृसत्तात्मक है जह...
वो बात जो जरूरी है