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Period Leave:क्या पीरियड्स लीव नहीं दी जानी चाहिए




आज जब हम सब खुद को बहुत आधुनिक कहते हैं लेकिन जब बात आती है पीरियड्स की तब या तो हम सार्वजनिक तौर पर उसका नाम लेने से बचते हैं या फिर हम उस शब्द को जितना हो सके कम ही इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। हद तो तब हो जाती है जब हमें इस बारे में कहने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है उस वक्त हम सबसे ज्यादा हिचकिचाते हैं केवल इसलिए कोई सुन न लें जैसे हम ये शब्द कहकर कोई अपराध कर रहे हो।


जहां सैनिटरी पैड कागज में लपेटकर और एसिड जैसी चीजें खुलेआम बिक रही हो।
जो आज दुनिया की आधी आबादी को सम्मान पूर्वक जीवन जीने का हक दे रही हो।

हम माने या न माने पर सच्चाई यही है कि आज भी हम कुछ चीजों को लेकर उतने ही असहज हैं जितना की पहले थे जिसको लेकर हम बिल्कुल भी नहीं बदले हैं। उस चीज को लेकर हम वहीं खड़े है जहां पहले खड़े थे मैं मानती हूं कि आज परिवर्तन की लहर आयी है पर अफसोस वो परिवर्तन की लहर कुछ चीजों को टस से मस नहीं कर पायी है।
आज जब ये सवाल आता है कि क्या पीरियड्स लीव दी जानी चाहिए?
तब पीरियड्स लीव न दी जाएं इसका समर्थन करने की बड़ी वजह यही है कि हम चीज समाज में रहते हैं वो समाज पितृसत्तात्मक है जहां महिलाओं से जुड़ी चीजों पर कम ही ध्यान दिया जाता है। ऐसे में जब बात पीरियड्स की आ जाती है तब उसे ध्यान नहीं दिया जाता हैं क्योंकि इसको लेकर पहली सोच ही यहीं होती है ये महिलाओ से जुड़ी हुई चीज है। इससे हमें क्या मतलब है। और अगर ऐसे में पीरियड्स के नाम महिलाओं को छूट्टी दी जाएगी तो उन्हें एक अलग तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ेगा। जहां वो पीरियड्स के नाम पर उनका मजाक बनाया जाएगा। और महिला कमजोर है ये इस बात प्रमाण माना जाएगा।
भले फिर वो क्यों न कितना अच्छा काम कर लें उन्हें कम ही समझ जाएगा। जबकि वास्तव में महिलाएं कहीं अधिक मजबूत अपने काम को लेकर प्रतिबद्ध है क ई रिसर्च में ये दावा किया गया है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक काम के प्रति समर्पित होती है वो जिस काम को करने की ठानती है उसे पूरा कर लेती है।
इस सब के बावजूद आज जब 2026 में सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लेकर सुनवाई करनी पड़े कि पीरियड्स लीव दी जानी चाहिए कि नहीं?
तब हम सबको ये सोचने समझने की कोशिश करनी चाहिए कि हम कोर्ट से और संस्थान से पीरियड्स लीव की मांग तो कर रहे हैं लेकिन हम अपने अंदर बैठी उस असहजता को खत्म नहीं कर पा रहे हैं जो पीरियड्स को लेकर आज भी बनी हुई है। जिसके लिए खुद हम सहज नहीं हैं फिर हम कैसे पुरूष वर्ग को कठघरे में खड़े करके ये कह रहे हैं कि वो हम से भेदभाव करते हैं जबकि हम खुद इतने सहज नहीं हैं हम पीरियड्स को लेकर
बातचीत कर सके। फिर हम कैसे इस विषय पर कुछ कह सकते हैं।


ये बात अलग है कि जहां देश के सार्वजनिक टायलेट की दशा खराब हो। जहां रास्ते में सिर्फ गड्ढे हो। जहां आप पीरियड्स के दाग को लेकर चिंतित हो। जहां पीरियड्स आपकी पवित्रता से जुड़ गया हो। जहां एक पढ़ें लिखे वर्ग के सामने आप ये शब्द न कह सके। जहां आप बुखार की तरह पीरियड्स चल रहे हैं ये कहकर थोड़ा आराम न कर सके। जहां आपको इसे गोपनीय करने की जरूरत हो। वहां पीरियड्स लीव की आवश्यकता तो है कि आप एक दिन का अवकाश लेकर कुछ आराम कर लें। ताकि आपको मानसिक और शारीरिक रूप से आराम मिले । और अगले दिन आप अच्छे से काम कर सके।





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