हम शायद भूल गए




खुद को सुनना‌
हम भूल गए हैं खुद को चुनना
हमने दूसरों को ही अपना आईना बना लिया है
हम भूल गए हैं अपने आप को चुनना
हमने चुन लिया है शब्दों को
हमने बंद कर दिया है किसी के मौन को समझना
हम भूल गए हैं इंसान को समझना
हमने चुन लिया है
इंसान के शौर को
हम ने चुन लिया है इंसान की बकवास को
हम नहीं सुनना चाहते
नहीं समझना चाहते किसी की 
खामोशी को
हमने चुन लिया के आज के ढोंग को
हम भूल गए हैं किसी के चेहरे के भाव को पढ़ना। 

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