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Showing posts from February 16, 2021

चाह नहीं

जब व्यक्ति के लिए स्वर्ग की कोई कामना नहीं रह जाती तो तब वो  लिखता है ' मुझे तोड़ लेना वनमाली  उस पथ पर देना फेंक   मातृभूमि पर शीर्ष चढ़ाने  जिस पर जाते वीर अनेक' माखनलाल चतुर्वेदी की ये कविता को आज पूरे 100 साल हो ग ए जिसे आज एक फिर कालजयी बनाने की कोशिश की जा रही है जो कि सराहनीय कार्य हो सकता है अगर हम संघर्ष करने को तैयार हो खुद के जीवन को साधारण रखकर अपने ख्वाब को आगे रखे " कहते हैं कि आसमान में वही चीज उड़ती है जो हल्की होती है " क्या आज हम तैयार है एक ऐसी जिंदगी को लेकर जहाँ केवल कष्ट हो भारतीय महाकाव्य में रामचरितमानस में एक जगह बड़ा अच्छा संवाद होता है जहाँ राम सीता को अपने साथ इसलिए वनवास नहीं ले जाना चाहते क्योंकि वो जनक की बेटी है जिसने कभी कांटों पर पांव नहीं रखा , किन्तु सीता राम के साथ जब वनवास गयी तो वो एक रानी यहाँ अयोध्या की पुत्र वधू नहीं बल्कि राम की धर्म पत्नी बनकर गयी. अनेक कष्ट के बावजूद उन्हें वनवास में अपना समय बिताया. तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखते हुए राम को भगवान माना किन्तु सीता को उन्हें एक सामान्य इंसान की तरह रखा जहाँ उन्होंने स...