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Showing posts from March 5, 2020

तु ही तु

तु ही तू घर में भी तू बाहर भी तू दुर्गा भी तू काली भी तू मेरा आज तू मेरा कल भी तू सुबह से उठकर रात के सोने तक कितना काम कर जाती तू कभी मां बनकर लोरी सुनती तू कभी पत्नी बनकर पति का हाथ बांटती तू कभी बहन बनकर भाई को सही राही दिखती तू। आज के समय आफिस तू भी जाती घर और बाहर दोनों काम तू झट से कर जाती तू। कभी अग़ेजो को नाको चने चबती  तू कभी झांसी के लिए बेटो को पीठ में रखकर पूरा युद्ध लड़ जाती तू कभी धर्म पत्नी बनकर अपने पति के प्राण यमराज से भी ले आती तू कभी कांटों में भी चलकर पति के साथ चौदह वर्ष वनवास कर आती तू तू ही तू। घर में भी तू बाहर भी तू हमेशा अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाती तू आज के समय में दफ्तर और घर दोनों में बेहतर काम करती जाती तू कभी पीवी, सिन्धु तो कभी दुतीचन्द कभी मैरी काम बनकर स्वर्ण पदक लाती तू कभी अर्थ शास्त्र की विशेष ज्ञ गीता गोपीनाथ न बना जाती तू कभी एक ताकतवर महिला के रूप में जर्मनी की चांसलर ऐजेला मार्कल कहलाती तू कभी अपने संघर्ष की करती इवाका  जैसी बेटी बना जाती तू ‌ भारत में तू लंदन में भी तू।

प्रक्रिया

किसी भी प्रक्रिया से निकलकर आगे कुछ करना ही जिंदगी की एक सीढ़ी  है बचपन में सीखने की प्रक्रिया, स्कूल में कक्षा 1से लेकर 12 तक की प्रक्रिया, कालेजों में सेमेस्टर की प्रक्रिया जो वैसे देखने में बिना नमक के खाने सी लगती है लेकिन उसे गुजरने का मजा ही कुछ होता है।  जिस प्रकार  कुछ ऐसे लोग होते हैं जो जीवन को सफल बनने के लिए लगातार प्रयत्न करते रहते हैं । वो एक संघर्ष की प्रक्रिया से गुजरते हैं।  सृजन भी एक प्रक्रिया है जिसे गुजर कर व्यक्ति किसी चीज का निर्माण करता है। अक्सर लोगों का प्रश्न होता है कि सृजन कैसे किया जाता है वो भी हमारे जीवन में  अनुभव से लेकर अभिव्यक्ति की प्रक्रिया होता है जिसे  हम गुजरते हैं  । इस समय लिखते वक्त मुझे इग्लिश के लेखक टी, एस इलियट की वो कविता याद आ गयी जिसमें " परिकल्पना में सृजन के बीच   भावना में कर्म के बीच,     पड़ती है परछाई जिसे बनता जीवन     जीवन की भुगरता "।