जब प्रलय आती है तो साथ अपने बहुत कुछ ले जाती है लग जाती है उस समय आरोप प्रत्यारोप की झड़ियां पर अपनी गलती कहां मानी जाती है। जहां अंधाधुंध विकास के नाम पर कितनी चटृानों को यू ही तोड़ दिया जाता है। बन जाएं चाहे जितने भी कानून उस पर अफ़सोस उसका हाल कहां कोई ले पाता है। भले तुमने कर ली अंतरिक्ष की सैर पर अपने आस पास के वातावरण को तुम कहां समझ पाते हो करते हो उपभोग उसका जब तक उसकी जान नहीं निकल जाती है और फिर कहते है ये तो 'गॉड ऑफ एक्ट' है इस नाम पर तुम प्रलय से अपना पीछा छूटाते हो। मंजिल तो तन लेते हो गंगनचुभी पर उसकी मजबूती कहां देख पाते हो। ऐसे में ये कहने में बिल्कुल हर्ज नहीं होती तुमने इंसान को हाथ दिए काम के लिए पर मस्तिष्क क्या उसे वातावरण के विनाश के लिए दिया है। कभी हिमाचल, कभी उत्तराखण्ड होती है तुम्हारी गलतियों का शिकार जहां मजबूती के नाम पर तुम विकास के पैमाने तो खड़े कर देते हो । ऐसे में ये कहने में देर नहीं लगती तुमने इंसान को हाथ क्या सिर्फ हर बार- बार प्रकृति के सामने फैलाने को दिए है जो प्रकृति क...
वो बात जो जरूरी है