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Showing posts from April 7, 2022

प्रतियोगितावादी युग में

  हिन्दी साहित्य में दो युग विशेष माने जाते हैं जिसमें से एक प्रयोगवाद दूसरा छायावाद है ∣  जिसमें लेखकों ने अपनी रचनाओं में अन्य युग के कवियों से कुछ नया लाने की सोची, जहां पर छायावाद युग में प्रकृति का मानवीयकरण किया गया वहीं प्रयोगवाद में रचनाओं के विषयों को मानव के दुख और उसके मन की कुंठ को देखकर रचनाएं लिखी गयी ∣  जिसका उद्देश्य मानव को उसके अस्तित्व का बोध करना था ∣ आज हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग चल रहा है जिससे हम सब भलीभांति परिचित हैं∣ जहां बात आज के दौर में प्रतियोगिता वादी युग की आती है, तो हम सब को नहीं भूलना चाहिए कि आज  आपकी श्रेष्ठता बहुत मायने रखती है  यहां वहीं इंसान अपने क्षेत्र में सफल हो सकता है∣    जिसमें  समय के अनुसार खुद में बदलाव करने की क्षमता है ∣ साथ ही वो हर परिस्थितियों में खुद को बेहतर करने का गुण अपने पास रखता हो  ∣ 

स्वास्थ्य

  स्वास्थ्य जिसका ध्यान  रखना आज सबसे मुश्किल ह़ो गया है    ∣   इस भागदौड़ भरी जिंदगी में  इसकी बेहतरी के लिए क्या करें या न करें इसके बारे में जैसे कुछ भी करने के लिए हमारे पास वक्त ही नहीं रह गया है    ∣   आज हम हफ्ते में एक दो दिन इसके बारे में थोड़ा बहुत विचार विमर्श कर लेते हैं वो भी तब  जब हमारा स्वास्थ्य किसी कारणवश खराब ह़ो गया हो,तब हमें मालूम चलती है उस स्वास्थ्य की कीमत जिसे लंबे समय तक ठीक रखना आज  पूरी दुनिया के लोगों लिए एक चुनौती सा हो गया है    ∣  आज समकालीन समय में जरूरी हो गया है कि हम अपने काम के साथ अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें क्योंकि अगर ये खराब हुआ तो हमारे बाकी सारे काम रूक जाएगें ,साथ ही हमारी वो दिनचर्या पूरी तरह से बिगड़ जाएगी जिसका हम लंबे समय से पालन कर रहे हैं  ∣