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प्रतियोगितावादी युग में

 
हिन्दी साहित्य में दो युग विशेष माने जाते हैं जिसमें से एक प्रयोगवाद दूसरा छायावाद है ∣ 

जिसमें लेखकों ने अपनी रचनाओं में अन्य युग के कवियों से कुछ नया लाने की सोची, जहां पर छायावाद युग में प्रकृति का मानवीयकरण किया गया वहीं प्रयोगवाद में रचनाओं के विषयों को मानव के दुख और उसके मन की कुंठ को देखकर रचनाएं लिखी गयी ∣ 
जिसका उद्देश्य मानव को उसके अस्तित्व का बोध करना था ∣

आज हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग चल रहा है जिससे हम सब भलीभांति परिचित हैं∣
जहां बात आज के दौर में प्रतियोगिता वादी युग की आती है, तो हम सब को नहीं भूलना चाहिए कि आज  आपकी श्रेष्ठता बहुत मायने रखती है यहां वहीं इंसान अपने क्षेत्र में सफल हो सकता है∣ 
 
जिसमें  समय के अनुसार खुद में बदलाव करने की क्षमता है ∣ साथ ही वो हर परिस्थितियों में खुद को बेहतर करने का गुण अपने पास रखता हो ∣ 

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Today Thought

कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

खुद को सुनना‌ हम भूल गए हैं खुद को चुनना हमने दूसरों को ही अपना आईना बना लिया है हम भूल गए हैं अपने आप को चुनना हमने चुन लिया है शब्दों को हमने बंद कर दिया है किसी के मौन को समझना हम भूल गए हैं इंसान को समझना हमने चुन लिया है इंसान के शौर को हम ने चुन लिया है इंसान की बकवास को हम नहीं सुनना चाहते नहीं समझना चाहते किसी की  खामोशी को हमने चुन लिया के आज के ढोंग को हम भूल गए हैं किसी के चेहरे के भाव को पढ़ना। 

life real meaning thought

पैसा सबके पास नहीं हो सकता..पर उसे कमाने का मौका सबको मिलता है.. गलतियां स्वीकार करने का हुनर सबके पास नहीं होता है..जिनके पास होता है..वो जीवन में बेहतर करते है.. लोगों का काम है बाते बनाना ये हम पर निर्भर करता है..हम उसे कैसे लेते है.. दुनिया सबकी नहीं हो सकती..कई बार उसे अपने लिए बनाना पड़ता है..