प्रतियोगितावादी युग में

 
हिन्दी साहित्य में दो युग विशेष माने जाते हैं जिसमें से एक प्रयोगवाद दूसरा छायावाद है ∣ 

जिसमें लेखकों ने अपनी रचनाओं में अन्य युग के कवियों से कुछ नया लाने की सोची, जहां पर छायावाद युग में प्रकृति का मानवीयकरण किया गया वहीं प्रयोगवाद में रचनाओं के विषयों को मानव के दुख और उसके मन की कुंठ को देखकर रचनाएं लिखी गयी ∣ 
जिसका उद्देश्य मानव को उसके अस्तित्व का बोध करना था ∣

आज हिन्दी साहित्य में आधुनिक युग चल रहा है जिससे हम सब भलीभांति परिचित हैं∣
जहां बात आज के दौर में प्रतियोगिता वादी युग की आती है, तो हम सब को नहीं भूलना चाहिए कि आज  आपकी श्रेष्ठता बहुत मायने रखती है यहां वहीं इंसान अपने क्षेत्र में सफल हो सकता है∣ 
 
जिसमें  समय के अनुसार खुद में बदलाव करने की क्षमता है ∣ साथ ही वो हर परिस्थितियों में खुद को बेहतर करने का गुण अपने पास रखता हो ∣ 

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