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Showing posts from October 30, 2020

ऐसा नहीं

 ऐसा नहीं कि तुम ही बरसात सह रहे हो  थोड़ी बरसातें हमने भी काटी है  ज्यादा नहीं थोड़ी पर हमने भी दुख भरी रातें काटी है यू ही नहीं मिलता सबकुछ एक झटके में,  "उसे पाने के लिए कितनी बरसातें बिना छतरी के हमने भी काटी है" तुफान से कब डर नहीं लगा हमें किन्तु क ई तुफान की सौगात जिंदगी में आना अभी बाकी है,  क ई आसूं क ई गम पीकर बड़े होते हैं हम  क्या तुम्हारी आंखों में आसूं अभी बाकी है परहेज कर लो थोड़ा रोने से क्योंकि थोड़ी आसुओं की बाढ़ अभी बाकी है,  इम्तिहान देते सब है इस जिंदगी में क ई तरह के  सभी लोग किन्तु किसी की जिंदगी को देख  उस पर हंसना क्या वाजिब है सब अपनी परिस्थितियों से लड़ते झगड़ते  किसी के लिए तो थोड़े आसूं अभी बाकी है  ऐसा नहीं है जिंदगी के इम्तिहान नहीं देते हम  क्या करे अब थोड़ा मुश्किलें छुपाना वाजिब है  ऐसा नहीं है हम कुछ करते वक्त गिरते और ठोकर खाते नहीं  किन्तु थोड़ा चलना अभी बाकी है कुछ नहीं तो अनुभव तो मिलेगा जिंदगी में खुद के लिए लड़ना अभी बाकी है.

ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मग्न

मीराबाई जो एक कवयित्री है जिनका जन्म राजस्थान के मेवाड़ में हुआ था जिन्होंने बचपन में ही अपने पति के रूप श्री कृष्ण को मान लिया था किन्तु परिस्थितिवश उनका विवाह राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हो गया कुछ समय पश्चात मीरा ने खुद को कृष्ण मय बना लिया और वो संतों के साथ बैठकर कृष्ण की भक्ति में लग गयी. उन पर अनेक तरह के अत्याचार कि ए गए हैं किन्तु वो कृष्ण की भक्ति में लीन रही. और कृष्ण की दीवानी के रूप में जानी जाने लगी. उनकी भाषा राजस्थानी मिश्रित भाषा है भारत के हिन्दी पघ साहित्य में भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा की कृष्ण भक्ति सखा में रैदास के बाद उनका महत्वपूर्ण स्थान है. मीरा बाई भले ही आज पंचतत्व में विलीन हो गयी हो किन्तु उनकी भक्ति और श्रद्धा आज भी हमारे आस पास दिखाई देती है उनके भजन हमें श्री कृष्ण की भक्ति करने को मजबूर करते हैं. आज मौजूदा समय में भगवान राम की उत्पत्ति होना तो मुश्किल है किन्तु कृष्ण की उत्पत्ति आज हुई है. आज उनकी भक्ति हमें सीखा रही है कि मानों तो गंगा माँ है न मानो तो बहता पानी.