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Showing posts from March 14, 2020

महंगाई

महंगाई बढ़ सी गयी है इसका अनुमान हम इसे लगा सकते हैं जो सांची का दूध हम कभी 3 रूपये में खरीदते थे अब उसकी कीमत 9 रूपये हो गयी है।  हमारी सैलरी तो नहीं बढ़ी लेकिन खर्च  बढ़ गया है इसका अनुमान हम बहुत सी चीजों से लगा सकते थे जैसे घर के राशन का सामान  कभी 1500 रूपये में एक महीने  भर के लिए  आ जाता था लेकिन अब 5000 के राशन में भी लगता है कि अभी और चीजे लेना बाकी है।  मुझे आज की महंगाई की परिस्थितियों को देखकर वो गाना याद आ गया कि " सखी सैया तो खूब ही कमात है महंगाई डायन खाए जाते है। " व्यक्ति की सैलरी जितनी नहीं बढ़ी होगी उसे कहीं ज्यादा वस्तुओं के दम बढ़  गऐ हैं हमें महंगाई से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता शायद लेकिन हमारे रह रहे नीचे तबके के लोग जो मजदूरी करके खाते है उनके लिए तो "आमदनी अठन्नी खर्चा रूपइया "।  समकालीन समय में हमारी संख्या तो ज्यादा हो गई लेकिन  उत्पादन के संसाधन सीमित है।  हमें अधिक संख्या से नहीं बल्कि गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा।  अर्थ शास्त्र के अनुसार किसी भी देश की अर्थव्यवस्था यदि विकास कर रही है...