मासिक धर्म हमारी कमजोरी नहीं तुम्हारी वो सोच है जो तुम्हें उसका नाम लेने से भी रोकती है जिसको लेकर न ग्रामीण, न शहरी सबकी सोच एक सी रहती है∣ कमजोर हम नहीं तुम्हारी वो सोच है जो गलती से भी लग जाएं दाग उसका तो न स्त्री न पुरुष सबकी वहीं सोच है। जो बस न सड़क न घर न परिवार न रिश्तेदार न पड़ोसी न मित्र यार सब एक है।
वो बात जो जरूरी है