तुम्हारी वो सोच है


मासिक धर्म हमारी कमजोरी नहीं
तुम्हारी वो सोच है
जो तुम्हें उसका नाम 
लेने से भी रोकती है
जिसको लेकर न ग्रामीण, 
न शहरी सबकी सोच
‌ एक सी रहती है∣
कमजोर हम नहीं तुम्हारी 
वो सोच है
जो गलती से भी लग जाएं
 दाग उसका
 तो न स्त्री न पुरुष
सबकी वहीं सोच है। 

जो बस न सड़क
न घर न परिवार
न रिश्तेदार न पड़ोसी
न मित्र यार
सब एक है।

 

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