इसे समय की विंडम्बना कहें या समाज का दोगलापन। पर बरसों से हम सब एक ऐसी चीज का पालन करते आ रहे है। जिसने एक वर्ग को बहुत ज्यादा शक्ति दूसरे को बहुत ज्यादा कमजोर कर दिया है। जिसके चलते समाज में असंतुलन की स्थिति पैदा हो गयी है। जहां महिला वर्ग को सहनशीलता की मूर्ति बन उन पर अत्याचार की सारी हदें पार की जाती है। जिसके बचाव में सिर्फ ये कह दिया जाता है। कि लड़की है इतना तो सहना ही होगा। वहीं दूसरे को इससे बचाव के लिए तनाव रख दिया जाता है। ऐसा करते वक्त हम ये भूल जाते है कि जब यहीं चीज सीमा पार कर दी जाती है तब वो अपराध बनने में देरी नहीं लगती है। आएं दिन की खबरें जब हम पढ़ते तो मालूम चलता है कि आज भी पुरुष वर्ग के द्वारा महिला के साथ कितनी क्रूरता की जाती है। जहां कभी पति से पैसे मांगने के चक्कर में उन्हें पुरुष की हिंसा का सामना करना पड़ता है। कहीं चरित्र में शक के चलते उनको उनके परिवार के लोगों के द्वारा मौत के घाट उतार दिया जाता है। जो सबके लिए सबसे सॉफ्ट टारगेट हो जाती है। इतने सब के बावजूद स्रब बरताने की घूंटी उस स्त्री को ही पिलाई जाती है। कि घर को बनाएं रखने क...
वो बात जो जरूरी है