किसी ने बिल्कुल सही कहा है जिस दिन को मनाया जाएं वो चीज हमेशा एक दिवस बनकर ही रह जाती है। महिला दिवस के मामले में भी कुछ ऐसा ही हाल है। जहां हम मार्च के एक दिवस को मना खुद को ये तसल्ली दिला देते है। कि सबकुछ सही तो चल रहा है। आखिर परेशानी क्या है? 'स्त्री पैदा नहीं होती वो बनायी जाती है' पर उसके अगले ही दिन से जैसे हर महिला को ये आईना दिखाया जाता है कि तुम से नहीं होगा। तुम्हें तुम्हारी सीमाएं बताने की कोशिश की जाती है। ऐसे में जैसे नारीवादी चिंतक सिमोन दे बोवुआर की बात वो सही सी लगती है 'स्त्री पैदा नहीं होती वो बनायी जाती है'। वो बनायी जाती है'। जहां उसे ये सिखाया जाता है कि केवल लज्जा ही तुम्हारा गहना है। तुम्हें ये नहीं करना वो नहीं करना । इसकी पूरी सूची तैयार की जाती है। जो इसे मान ले वो सही वरना वो बेशर्म कहलाती है। जिसे बात बात पर ये कहा जाता है कि तुम कैसी लड़की है। कुछ सिखाया ही नहीं है। अफसोस वो केवल इसमें सिमट कर रह जाती है। जिसमें शिक्षित न अशिक्षित सब बराबर से होते है। केवल फोन नया है सोच वहीं पुरानी है ऐसे में इस विषय पर बात करना जरुरी हो ...
वो बात जो जरूरी है