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Showing posts from January 9, 2020

छोटे छोटे सुख

कितना अच्छा लगता है आज भी भीड़ के साथ चलना छोटी - छोटी बातों पर खुश होना । किसी प्रोग्राम में अगर गये है तो सीट मिलने पर खुश होना। आज हम बहुत कुछ पाने के चक्कर में इन छोटी खुशी को भूला सा गये है। मुझे इस विषय पर बात करते हुये लेखक रामदरश का निबंध 'छोटे -छोटे सुख 'याद आया। जिसमें उनके निबंध की वो लाईन "मैं छोटा हूँ छोटा आदमी ही बना रहना चाहता हूँ।" मुझें भीड़ में जाना पसंद है लोगो के बीच चाय पीना पसंद है और ऱोज सुबह चायवाले के पास अखबार पढ़ना पसंद है। मैं बहुत बड़ा आदमी नहीं बना चाहता जिस कारण से लोग मुझें बड़ा आदमी कहकर पुकारे । मैं कहीं जाऊं तो लोग मुझे चाय नाश्ता दे जहां मुझें नहीं बुलाया गया हो वहां में नहीं जाऊं। चौबीसो घंटे मीडिया की मुझ पर नजर हो, मेरा उठना बैठाना सब सार्वजनिक हो। मुझे उनके इस निबंध ये पंक्ति बहुत सही लगी कि मे़ैं अपने काम का स्वयं उतरदायी हो। कोई भी छोटा काम जैसे बस में सीट मिलने पर खुश हो जाऊं।

एक अनसुनी कहानी

क्या आप सोच सकते है कि कोई बच्चा बूढ़ा पैदा हो और वो दिखाने में तो नवजात शिशु की तरह हो पर उसकी शक्ल सूरत बूढ़े जैसी हो मैं कोई अनोखी सी बात नहीं कह रही हूँ । सन् २००८ में The curious case of Benjamin button film के बारे में बात कर रही हूँ जिसमें मनुष्य के जन्म और उसके रूप को इस तरह से दिख़ाया गया है जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते है। इस फिल्म का मुख्य किरादर बेजामिन बटन जो जन्म से बूढ़ा पैदा होता है उसके साथ कई चीजे अजीब होती है सामान्य मनुष्य की तरह वो नहीं होता है वो पैदा तो बूढ़ा होता है लेकिन मरता बच्चा बनाकर है। " इस कहानी में वो परिदृश्य दिखाया गया है जिसमें वो अपनी प्रेमिका की गोद में मरता है वो दृश्य मोहब्बत के अलग ही रूप को दिखता है ।" आज के समय हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते है कि ऐसा कुछ भी हो सकता है। इस फिल्म को देखते हुये आपके मन में कई प्रकार की प्रश्ना जागगे जिनको उतर आपको इस फिल्म The curious case of Benjamin button में मिल जाऐंगे।