कितना अच्छा लगता है आज भी भीड़ के साथ चलना छोटी - छोटी बातों पर खुश होना ।
किसी प्रोग्राम में अगर गये है तो सीट मिलने पर खुश होना।
आज हम बहुत कुछ पाने के चक्कर में इन छोटी खुशी को भूला सा गये है।
मुझे इस विषय पर बात करते हुये लेखक रामदरश का निबंध 'छोटे -छोटे सुख 'याद आया।
जिसमें उनके निबंध की वो लाईन "मैं छोटा हूँ छोटा आदमी ही बना रहना चाहता हूँ।"
मुझें भीड़ में जाना पसंद है लोगो के बीच चाय पीना पसंद है और ऱोज सुबह चायवाले के पास अखबार पढ़ना पसंद है।
मैं बहुत बड़ा आदमी नहीं बना चाहता जिस कारण से लोग मुझें बड़ा आदमी कहकर पुकारे ।
मैं कहीं जाऊं तो लोग मुझे चाय नाश्ता दे जहां मुझें नहीं बुलाया गया हो वहां में नहीं जाऊं।
चौबीसो घंटे मीडिया की मुझ पर नजर हो, मेरा उठना बैठाना सब सार्वजनिक हो।
मुझे उनके इस निबंध ये पंक्ति बहुत सही लगी कि मे़ैं अपने काम का स्वयं उतरदायी हो। कोई भी छोटा काम जैसे बस में सीट मिलने पर खुश हो जाऊं।
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