यू तो आज हर गली ये खबर तेजी फैली है कि भ्रष्टाचार नाम की ये चिड़िया होती क्या है वो असल में आज भी जानते नहीं है वो लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोग है। इसके बावजूद उन लोगों को कौन समझाएं कि जब बात पेंशन की अर्जी लगाने की आती है तब उस पर हस्ताक्षर बड़े साहब तब ही करते है जब उनकी जेब गर्म की जाती है। आज जब देश बड़ी- बड़ी ऊंचाई की ओर कदम से कदम मिला रहा है तब ऐसे समय में ये जरूरी हो गया है हम सब अपनी उन बुराईयों को खत्म करें। जो हमारे देश को दीमक की तरह खोखला बनाती जा रही है। ऐसे समय में हरिशंकर परसाई के लेख ' सदाचार के ताबीज ' पर बात करना आज ज्यादा जरूरी हो जाता है। राजा को नहीं पता कौन है भ्रष्टाचारी 'सदाचार के ताबीज' को जब हम पढ़ते है तब पाते है कि किसी राज्य का राजा आजकल बड़ी ही परेशानी का सामना कर रहा है। दरअसल बात इतनी सी है कि उस राजा को अपने राज्य से भ्रष्टाचार को खत्म करना है किन्तु उसे मालूम ही नहीं है कि ये भ्रष्टाचार किस चिड़िया का नाम है? ऐसे में वो राजा अपने मंत्रियों से कहकर ऐसे विशेषज्ञों को खोजने की बात करता है जो भ्रष्टाचार को करीब से जानते है। ...
वो बात जो जरूरी है