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आज के समय में भ्रष्टाचार की सही परिभाषा बताता है हरिशंकर परसाई का 'सदाचार का ताबीज'


यू तो आज हर गली ये खबर तेजी फैली है कि भ्रष्टाचार नाम की ये चिड़िया होती क्या है वो असल में आज भी जानते नहीं है वो लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोग है। इसके बावजूद उन लोगों को कौन समझाएं कि जब बात पेंशन की अर्जी लगाने की आती है तब उस पर हस्ताक्षर बड़े साहब तब ही करते है जब उनकी जेब गर्म की जाती है।
आज जब देश बड़ी- बड़ी ऊंचाई की ओर कदम से कदम मिला रहा है तब ऐसे समय में ये जरूरी हो गया है हम सब अपनी उन बुराईयों को खत्म करें। जो हमारे देश को दीमक की तरह खोखला बनाती जा रही है। 
ऐसे समय में हरिशंकर परसाई के लेख 'सदाचार के ताबीज ' पर बात करना  आज ज्यादा जरूरी हो जाता है।

राजा को नहीं पता कौन है भ्रष्टाचारी

'सदाचार के ताबीज' को जब हम पढ़ते है तब पाते है कि किसी राज्य का राजा आजकल बड़ी ही परेशानी का सामना कर रहा है। दरअसल बात इतनी सी है कि उस राजा को अपने राज्य से भ्रष्टाचार को खत्म करना है किन्तु उसे मालूम ही नहीं है कि ये भ्रष्टाचार किस चिड़िया का नाम है? 
ऐसे में वो राजा अपने मंत्रियों से कहकर ऐसे विशेषज्ञों को खोजने की बात करता है जो भ्रष्टाचार को करीब से जानते है। मंत्रीगण राजा का आदेश मान ऐसे बुद्धिमानों को खोजने की ओर चल पड़ते है । तब वो पांच ऐसे इंसान को राजा के समक्ष लाते है जो भ्रष्टाचार के बारे में सबकुछ जानते है।
राजा उनसे पूछता है कि आखिर ये भ्रष्टाचार किस चिड़िया का नाम है?
तब पांचों विशेषज्ञ एक स्वर में कहते है कि ये हमारे अंदर मौजूद एक भाव है। इसके चलते हम लालच कर बैठते है।जो आज हर जगह मौजूद है। आपके इस राज्य महल के हर कोने में वो निवास करता है। आप जिस पगड़ी को पहने है वो भी भ्रष्टाचार से लिप्त है जिसकी मरम्मत के नाम पर आपके मंत्री न जाने कितना धन ले लिया करते है। 
तब राजा भ्रष्टाचार से मुक्ति के लिए उन विशेषज्ञों की राय मांगता है ? 
तब वो विशेषज्ञ राजा से इसे समझने के लिए कुछ वक्त मांगते है। कुछ दिनों के बाद वो राजा को एक सूची देते है जिसके अनुसार किए गए परिवर्तन से राजा भ्रष्टाचार से मुक्ति पा सकता है ।राजा कई दिनों तक उस सूची को पढ़ता है उस परिवर्तन के बारे सोच सोच ही वो बीमार पड़ जाता है। तब राजा अपने मंत्री से कहता है तुम लोग इसे पढ़ो और फिर मुझें बताओं कि अपना इसे कैसे कर सकते है।
तब मंत्री राजा को कहते है कि अगर हमारी बात मानें तो ये सब रहने दे क्योंकि ये हमारी राजव्यवस्था को पूरी तरह से बिगाड़ देगा।
हम इसके सुधार के लिए कोई दूसरा उपाय खोजते है।
तब मंत्रीगण एक दिन एक साधू के साथ राजा के दरबार में पहुंचते है। तब राजा पूछता है ये साधू कौन है ?
तब मंत्री बताते है कि ये एक सदाचारी साधू है जिसके पास एक ऐसा ताबीज है जिसको पहनने से लालची इंसानी भी सदाचारी बन जाता है।
तब राजा कहता है कि अगर सच में इससे ये चमत्कार होता है तो मैं इस साधू से  करीब 5 हजार ऐसे ताबीज को मेरे राज्य की जनता के लिए ये बनाने का आदेश देता हूं ।
तब राजा के आदेश पर साधू सदाचार के ताबीज बनाने में लग जाता है। करीब एक माह की मेहनत के बाद वो साधू राजा को ताबीज सौपा देता है।
राजा इसे अपने पूरे राज्य में बांटवाने का आदेश देता है वो खुद भी एक ताबीज पहन लेता है।
अब राजा पूरी चिंता से मु्क्त हो जाता है कि उसके राज्य की बड़ी परेशानी टाल गयी है ।
एक दिन राजा सोचता है क्यों न वो जाकर खुद अपने राज्य में उसका परिवर्तन देखें ।
तब राजा के गरीब के वेश में एक अनाज की दुकान से चावल का दम पूछता है ?
 व्यापारी उस चावल का दम 2 रूपये प्रति किलो बताता है।
राजा महल में आकर बड़ा खुश होने लगता है कि उसका राज्य अब लालच से मुक्त हो गया है।
ऐसे ही कुछ दिन वो व्यतीत करता है ।
एक दिन फिर राजा ताबीज के असर को पता करने के लिए गरीब के वेश में राशन की दुकान जाता है तब वो व्यापारी से गेहूं का पूरा मूल्य पूछता है?
व्यापारी उस गेहूं का मूल्य 50 रूपये बताता है जबकि उसका मूल्य 10 रूपये चल रहा होता है। तब राजा गुस्से से लाल होकर वहां से निकल जाता है। 
राजा रास्ते में ताबीज से कहता है कि तुम्हारा तो अब कोई जादू हैं ही नहीं। तब ताबीज धीरे स्वर में कहता है कि जिस दिन तुम चावल के भाव पता करने गए थे उस दिन 1 तारीख थी आज महीने की आखिरी 31 तारीख है।  

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