अर्ज किया है सनम तेरी कसम कॉरेपारेट जॉब में नहीं है कोई दम सैलरी के नाम में पैसे को होती मुंह दिखाई महीना खत्म होते ही अच्छे अच्छे की लग जाती है भाई चाहे सैलरी कितनी भी हो खर्च के आगे वो भी पड़ जाती कम है भाई सोचा था नौकरी करके शौक पूरे होगे पर अब तो घर का रेंट भी दूसरों से लेकर देना पड़ रहा है हम से अच्छे तो मजदूर है जिन्हें हर दिन दिहाड़ी के नाम पैसे तो मिलता है भाई।
वो बात जो जरूरी है