corporate life poem in hindi


अर्ज किया है सनम तेरी कसम 
कॉरेपारेट जॉब में नहीं है कोई दम
सैलरी के नाम में पैसे को होती मुंह दिखाई
महीना खत्म होते ही अच्छे अच्छे की लग जाती है भाई
चाहे सैलरी कितनी भी हो
खर्च के आगे वो भी पड़ जाती कम है भाई
सोचा था नौकरी करके शौक पूरे होगे
पर अब तो घर का रेंट भी दूसरों से लेकर देना पड़ रहा है
हम से अच्छे तो मजदूर है जिन्हें हर दिन दिहाड़ी के नाम पैसे तो मिलता है भाई। 

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