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Showing posts from March 11, 2020

विचार

दोपहर को सोने का मजा ही अलग होता है ठीक छुट्टी के समय लेट उठने जैसा। रोज नहीं तो कभी कभी ही अपने को  भी याद करने  का समय निकल लेना चाहिए। किसी विषय पर लिखने और बोलने से भी ज्यादा जरूरी है उस पर पहले चिन्तन मनन कर लेना। किसी को जानने और समझने का सबसे अच्छा तरीका है उसके व्यवहार आचरण को समझ लेना। किसी किताब को पूरा पढा़ने से कुछ नहीं तो लिखने और समझने की शैली तो समझ आ ही जाती है। सपने अक्सर हमें चौकने और डराने वाले होते हैं।

आज भी क्यों खामोश है हम इस विषय पर

  आज के समय भी कई  लड़कियां पीरियड आने के बाद स्कूल नहीं जाती कुछ तो  स्कूल ही छोड़  देती है और कुछ पीरियड के कारण कई दिनों तक अपने स्कूल और आफिस से छूटी ले लेती है।  आज गूगल और यूट्यूब पर इसकी सैकड़ों फिल्म और डाक्यूमेंटरी बनी पडी और इसे सम्बंधित जानकारी है और अब तो  इस पर मूवी भी आ गयी है अक्षय कुमार की  'पैड मैन'। लेकिन बात वही पर है कि आज हमारा पुरूष प्रधान समाज इस बात को मनाने को तैयार है कि लड़कियों को इस विषय पर बोलने को आजादी है शायद नहीं क्योंकि उनका तो ये मानना है कि ये तो बस लड़कियों की परेशानी है ।  अभी कुछ समय से एक शब्द बहुत चल रहा है जिसका नाम है " 'पीरियड पावर्टी' "स्काटलैंड वेबसाइट पर कुछ ऐसी विषम परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है जिनके चलते माहवारी महिलाओं के लिए 'कड़वा अनुभव' बन जाती है मसलन बेघर होना, किसी तरह की लाचारी और एंडीमीट्रियोसिस जैसी स्वास्थ्य संबंधी तकलीफ। ' माहवारी की मर्यादा ' इसे महत्व देते हुए स्काटलैंड में एक विधेयक लाया गया है इसके तहत जिस किसी को भी जरूरत होगी, उसे निशुल्क सैनिटरी पैड व उत्पाद उपल...