Loksabha Election: हर मांगे जैसे अभी पूरी की जा रही है। लाईट भी चली जाएं तो वो झट से आ रही है। सब्जी से ले गैस के दाम सस्ते हो गए है। इतनी मेहरबानी क्याें। क्या अब चुनाव सिर पर है। चुनाव जो हिसाब मांगता है वैसे तो चार सालों तक उस जन की कुछ न चलती है । जहां न बात रोजगार की, न व्यापार और न मंहगाई की होती है। जनता वहां अदृश्य सी दिखाई पड़ती है । उसकी परेशानियों से सरकारें आंखे बंद कर लेती है। ये इलेक्शन ही होता है जहां जनता अपने वोट से हिसाब करती है। जो हर जगह से सिर्फ ठगा जाता है वो जनता जिसे उसके हक भी दान जैसे दिया जाता। बड़े बड़े पोस्टरों में मुस्कुराते चेहरे दिखा, उसे खुश करने की हर सम्भव कोशिश की जाती है। केवल वो ही जानता है कि वो कितना ठगा जाता है। जो जब विवश हो जाता है तब वो सड़को पर धरना देने जाता है। वोट के लिए ही तो जाना जाता है चुनाव ही तो एक ऐसा समय होता है। जब सिंहासन पर बैठी सरकारों को आम जन की अहमित होती है। वरना क्या हाल उसका, क्या उसकी थाली का? इससे किसी को जैसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। पांच साल का जब हिसाब लेती है ये चुनाव ही त...
वो बात जो जरूरी है