जैसे पूछती सवाल तुम से ये डाली आखिर क्यों चुप हो क्यों तुम कुछ बोलती नहीं क्यों हो तुम चिंताओं के घेरे में साझ हुई तुम अभी भी व्याकुल हो क्यों आज क्या नहीं है तुम में ये जानने की जिज्ञासा ये रात क्यों है इतनी काली बोलो न क्यों मौन हो तुम क्या आज प्रश्न नही तुम्हारे पास क्यों है ये मुरझाया हुआ मनुष्य जिसके चारों और है हरियाली फिर भी लगता जैसे उपवन खाली ∣
वो बात जो जरूरी है