कहते हैं कि लेखन में वो ताकत होती है जो कि न सिर्फ व्यक्ति के पढ़ने के लिए बल्कि वो उसके विचारों का लिखित साक्ष्य होती है. रामधारी सिंह दिनकर का लेखन में कुछ इसी प्रकार का है उनके लेखन में एक जगह वीर रस की प्रधानता है तो वहीं दूसरी ओर उनका लेखन किसी व्यक्ति के लिए सोचने का एक अलग नजरिया देता है रामधारी दिनकर के रचना संस्कृति के चार अध्याय, रश्मिरथी प्रमुख है. रश्मिरथी में व़ो पद्म के रुप में लेखन है जिसमें वो महाभारत के मुख्य पात्र कर्ण के बारे में पहले सर्ग में कहते हैं *जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती कुमारी उसका पलना हुआ धार पर बहती हुई पिताजी सूत - वंश पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर, निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्धभुत वीर. *तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी, जाति - गोत्र का नहीं, शील का पौरूष का अभिमानी ज्ञान - ध्यान, शस्त्रास्त्र , शास्त्र का कर सम्यक् अभ्यास, अपने गुण का किया कर्ण, जग की आंखों से दूर. आज मौजूदा समय में दिनकर का लेखन हमारे लिए कभी न बुझने वाले दीपक की तरह है जिनकी रचना के माध्...
वो बात जो जरूरी है