इस उपन्यास की कहानी में एक गोरा नाम का युवक है जो कि शुरू से ही अपने आप को हिंदू समझता है जो नियम धर्म का बहुत पक्का है वो अपनी माँ आनंदमई
के बनाये हुए भोजन को केवल इसलिए नहीं करता क्योंकि उसकी माँ आनंदमई कोई भी नियम धर्म नहीं मानती है वो अपने घर आयी कुम्हारन से किसी भी तरह की दूरी नहीं रखती यहाँ तक की वो कभी कभी उसके घर चाय तक पी आती है.
जब गोरा के पिता की तबीयत अचानक खराब हो जाती है तब उसके पिता ये चाहते हैं कि मेरे मरने से पहले ही गोरा को ये मालूम चले जिस हिन्दू समाज के लिए वो
हमेशा दूसरों की बातों को अनदेखा करता है असल में वो उसका है ही नहीं .
जब गोरा को उसके पिता के द्वारा मालूम चलता है कि वो आनंदमई का बेटा नहीं है तब वो बहुत टूट सा जाता है.
वो परेश बाबू के पास जाता है जो कि एक आध्यात्मिक व्यक्ति हैं और गोरा कहता है कि मैं हिन्दू नहीं हूँ मैं अब इस संसार से मुक्त हो गया हूँ मैं आपका शिष्य बनना चाहता हूँ .
**आज आप मुझे उसी देवता का मंत्र दीजिए जो हिंदू, मुस्लिम, खिस्तान - ब्राह्म सबका है जिसके मंदिर के द्वारा किसी भी जाति के लिए भी बंद नहीं है जो सिर्फ हिंदू का देवता नहीं है बल्कि सारे भारतवर्ष का देवता है.**
ये उपन्यास में मुख्य रूप से की अन्तरजातिय विवाह, बाह्यय आडम्बर जैसी विषय पर अपनी बात रखता है साथ ही साथ या
आध्यात्मिकता की एक नयी परिभाषा भी गढ़ता है.
इसकी भाषा सरल और सहज है कहीं - कहीं मुहावरों के प्रयोग ने इसकी भाषा में चार चांद लगा दिए है.
समकालीन समय में गोरा का महत्व और भी ज्यादा हो गया है जहाँ हर किसी की धर्म के प्रति अपनी अलग आस्था है .
𝗚𝗼 𝗻𝗼𝘁 𝘁𝗼 𝘁𝗵𝗲 𝘁𝗲𝗺𝗽𝗹𝗲 𝘁𝗼 𝗽𝘂𝘁 𝗳𝗹𝗼𝘄𝗲𝗿𝘀
Upon the feet of God,
𝗙𝗶𝗿𝘀𝘁 𝗳𝗶𝗹𝗹 𝘆𝗼𝘂𝗿 𝗼𝘄𝗻 𝗵𝗼𝘂𝘀𝗲 𝘄𝗶𝘁𝗵 𝘁𝗵𝗲
𝗙𝗿𝗮𝗴𝗿𝗮𝗻𝗰𝗲 𝗼𝗳 𝗹𝗼𝘃𝗲 𝗮𝗻𝗱 𝗸𝗶𝗻𝗱𝗻𝗲𝘀𝘀.
Ravindra Nath Tagore.

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