Skip to main content

बेटी ब्याही जाती है दहेज के उसूले से बताता है प्रेमचंद का उपन्यास निर्मला



बेटी ब्याही जाती है घर की दीवारों से
केवल नहीं ब्याही जाती है अपने स्वाभिमान से
अपने सपनो से,
बेटी ब्याही जाती है दहेज के उसूले से
जो नहीं होने पर ब्याह दी जाती है
अपने पिता की उम्र के लड़को से।

एक लड़की की जिंदगी देखने में आज भी कितनी चमकदार लगती है । पर अफसोस वो केवल किसी दूसरे के घर जाना है इसी के लिए तैयार की जाती है। इसकी सारी ख्वाहिशें शादी की रस्मों के साथ खत्म हो जाती है।
चाहे कितने भी अभिजात वर्ग की हो ये लड़की पर उसकी लंबाई तो उसके दहेज  के  कद से नापी जाती है। 
अफसोस आज 2023 के वक्त में भी जब दुनिया चांद  पर बसने के सपने देख रही है तब भी उस बेटी का कद तो केवल उसके दहेज से नापी जाती बैठा है। कभी जलती है वो दहेज की कमी से, तो कभी दहेज की सारी मांग पूरी न होने से जो हो चाहे नवविवहिता या, या अभी ब्याही जाने वाली उसकी किस्मत तो केवल दहेज से शुरु उससे ही खत्म हो जाती है।
इसी कड़ी में जब हम प्रेमचंद को पाते है तब निर्मला जैसी बहुत सी लड़की की कहानी हमारे चारों तरफ घुमते हुए नजर आती है। जहां आज भी दहेज की कमी के कारण अच्छे रिश्ते टूट जाते है। गलती से मिल जाएं  अच्छा रिश्ता तब भी उसके पिता की पागड़ी उसके ससुराल वालो के पैरो की जूती बन जाती है जो केवल जब तक ही रखी रहती है जब तक वो उनकी झोली भरता जाता है। 
आज भी हर दूसरे घर में बैठी निर्मला जैसे सवाल करती है कि वो सिर्फ और सिर्फ ब्याही जाने के लिए पैदा की जाती है उसके सपने शादी के कुण्डा की तरह जलकर खाक हो जाते है। वो तब भी ससुराल इस  उम्मीद से जाती है कि सब का ख्याल रखेगी पर टीवी ससुराल की तरह सास औऱ नंनदों की तऱह बन बैठी वो खुद लड़की कहां उसे चैन की बंशी बजाने देती है। दहेज कितना भी दे दे  उसका पिता पर उसे ताने तो उसे इसके ही मिलेेगें ।  तेरे बाप ने दिया ही क्या है?
अफसोस आज भी न जानें कितनी लड़कियों की कहानी निर्मला से शुरू उससे ही खत्म हो जाती है। 

Comments