Women struggle Article: नारी जन्म से लेकर मरण तक कहीं स्वतंत्र नहीं



ये बात कहने में जिंदगी कड़वी हैं उतनी ज्यादा सच है कि एक महिला के तौर पर भारत जैसे देश में रहने का मतलब अनेक तरह के बंधनों से बंध जाना है। जहां उसकी जिंदगी उसके हिसाब से नहीं बल्कि इस हिसाब से चलती है कि लोग क्या कहेंगे।
जो अनेक तरह की बेड़ियों में लिपटीं। जो कहीं भी स्वतंत्र नहीं है यहां तक की जब वो मृत्यु शय्या पर हो उस वक्त भी उसे दस तरह के नियम कायदों को मानना पड़ता है।  जहां उसके अपने उसकी लाश की फ्रिक नहीं करते जो नियमों में बांधकर उसे चैन से मरने नहीं देते हैं। अफसोस इसके बावजूद आज की आधुनिक लड़की जो खुद को आधुनिक बताती हैं वो भी इस तरह के बंधनों में लिपटी हुई है। जो सिर्फ एक भारतीय नारी बनना चाहती है।न कि एक समाज सुधारक नारी जिसे देखकर आज भी सावित्री बाई फुले जैसी महिलाओं के साहस की तारीफ करना बनता है जिन्होंने समाज के उस बंधनों को तोड़ जो समाज की आधुनिक महिलाएं आज तक नहीं तोड़ पायी है।

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