कितनी अजीब बात है जिस जिंदगी का एक पल ठिकाना नहीं उसे बेहतर करने के लिए इंसान अक्सर बहुत कुछ ऐसा छोड़ देता है जो चाहकर भी दोबारा नहीं मिल सकता है जिसके बाद उसके हाथ में पछतावे के अलावा कुछ नहीं रह जाता है।
कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है। आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो।
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