क्या हादसे आम इतने आम हो ग ए है
कि अब मृतकों की संख्या से हमें फर्क नहीं पड़ता
अखबारों में कितनी खबरें आ जाए
उसके बारे में जानने का हमें मन नहीं करता
क्या अब हम इतने ज्यादा असंवेदनशील हो गए है
कि अब हमें ऐसी चीजों को जानने का मन नहीं करता
जहां इंसान की जिंदगी की कोई कीमत नहीं
जहां मुआवजे तक सीमित हमारी संवेदनाशीलता है।

Comments