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surpanakha dahan: क्या शूर्पणखा दहन किया जाना चाहिए

क्या शूर्पणखा दहन किया जाना चाहिए 



दशहरे में रावण का दहन किया जाता है।ये दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के तौर पर देखा जाता हैं

। पर इस बार दशहरे की चर्चा किसी खास चीज के लिए की जा रही है।

वो हैं इंदौर में पौरुष संस्था के द्वारा शूर्पणखा के दहन करने की। जिसमें सोनम रघुवंशी के साथ उसे जैसी तमाम युवतियों के नाम थे जिन्होंने अपने पति या पुरुष को धोखा दिया।उनकी हत्या की या उन्हें आत्महत्या करने को मजबूर किया।जिनका इस बार पुतला दहन किये जाने की कोशिश थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है।

इसके बावजूद जब शूर्पणखा के दहन पर जोर दिया जा रहा है।तब ये सवाल वाजिब हो गया है।कि सदियों से महिलाओं के साथ गलत करने वाले आज किस मुंह से महिलाओं के पुतले का दहन करने जा रहे हैं। जिन्होंने कैंडल मार्च से ज्यादा आज तक कुछ नहीं किया।

जिस समाज ने महिलाओं के साथ गलत होने पर किसी पुरुष के पुतले का दहन नहीं किया। जिन्होंने तब भी उस महिला को ही गलत पाया। वो शूर्पणखा का दहन कर रहे हैं।

इस सब के बावजूद भी अगर शूर्पणखा का दहन होता है तो करिए लेकिन उससे पहले उन रावणों का भी दहन की जाएं। जिनके चलते कोई भी सीता सुरक्षित नहीं है।



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कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है।  आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो। 

हम शायद भूल गए

खुद को सुनना‌ हम भूल गए हैं खुद को चुनना हमने दूसरों को ही अपना आईना बना लिया है हम भूल गए हैं अपने आप को चुनना हमने चुन लिया है शब्दों को हमने बंद कर दिया है किसी के मौन को समझना हम भूल गए हैं इंसान को समझना हमने चुन लिया है इंसान के शौर को हम ने चुन लिया है इंसान की बकवास को हम नहीं सुनना चाहते नहीं समझना चाहते किसी की  खामोशी को हमने चुन लिया के आज के ढोंग को हम भूल गए हैं किसी के चेहरे के भाव को पढ़ना। 

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पैसा सबके पास नहीं हो सकता..पर उसे कमाने का मौका सबको मिलता है.. गलतियां स्वीकार करने का हुनर सबके पास नहीं होता है..जिनके पास होता है..वो जीवन में बेहतर करते है.. लोगों का काम है बाते बनाना ये हम पर निर्भर करता है..हम उसे कैसे लेते है.. दुनिया सबकी नहीं हो सकती..कई बार उसे अपने लिए बनाना पड़ता है..