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त्योहार बनाम पटाखे 


परिवर्तन संसार का नियम है।जिसका होना एक सतत प्रक्रिया है। जिस तरह पानी का लगातार बहते रहना जरूरी है। ठीक उसी तरह समय के साथ उन चीजों में परिवर्तन जरूरी है जो समय की मांग है ।
लेकिन इसके बावजूद उन चीजों में हम परिवर्तन की मांग न करें।जो हमारी जिंदगी को तबाह कर रही है।आज जब पटाखे बनाम त्योहार पर बहस छिड़ी हुई है। जहां हम त्योहार को पटाखों से जोड़कर सनातन धर्म का अर्थ बता रहे हैं। वहां हमें ये देखना जरूरी है कि उसका हमारे सामाजिक परिवेश में क्या असर पड़ रहा है। क्या वाकई उसके न करने से हमारे त्योहार पर कोई खासा असर पड़ रहा है।क्या वास्तव में वो हमारे त्योहार से जुड़ा भी है। 
बिना इन सवालों के जवाब लिए बगैर हमें कुछ भी नहीं कहना चाहिए।

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