बहुत आसान है दूर से खड़े होकर जज मेंटल बनना उसके बारे में कुछ भी कह देना। पर बहुत, मुश्किल है उसकी जगह पर खड़े होकर कुछ सोचना। जहां वो ही जानता है कि वो कितना कुछ सह रहा है । ये दो कौड़ी की नौकरी असल में क्या चीज है केवल वो ही जानता है। जिसके लिए हर दिन वो खुद को खत्म कर रहा है। छोटी सी सैलरी और खुद को बनाए रखने के लिए कितना कुछ सह रहा है।
कौन क्या कहता है हमारे बारे ये सोचने में ही हमारा आधा वक्त निकल जाता है। आधी से ज्यादा लड़ाई केवल इसलिए होती है कि हमारा नजरिया अपने लिए हमेशा सही दूसरों के लिए गलत होता है। भले फिर क्यों औरों की कहानी में हम भी बुरे हो।
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