जब जब बात बराबरी की आयी
तब तब उसे कमजोर करने की सजिश बनाई
किसी ने कहा प्रकृति ने उसे कमजोर बनाया
किसी ने कहा थोड़े ज्ञान पर वो इतराती
सब ने गढ़ी परिभाषा
हर मोड़ पर उसे सिर्फ कम आंका
जहां आज भी बहुत कुछ बदला नहीं
जाती नौकरी महिला पर आज भी बहुत कुछ बदला नहीं
जहां अब भी नहीं उनकी जमीन
बनाने अपनी जमीन नापना उन्हें बहुत बड़ा रास्ता
अब भी बहुत कुछ नहीं बदला
बराबरी क्या मूलभूत अधिकार के लिए आज भी उन्हें लड़ना पड़ता
बात आज भी जब बराबरी की आती तब वो कम ही समझी जाती
कौन समझाए उसे कि वो कम हो ही नहीं सकती
घर और बाहर की जिम्मेदारी निभाने वाली सिर्फ गोल रोटी बनाना नहीं वो आटा कमाना भी जानती।
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