इस विडंबना न कहूं तो क्या
जहां अनिश्चितता के घेरे में इंसान कुछ निश्चित करने में अपना वो सबकुछ लगा देता है। जो शायद उसे फिर कभी न मिले।
जहां ये जानते हुए कि उसका समय बहुत सीमित है। इसके बावजूद वो अपने आप को इतना सीमित कर लेता है जैसे वो कभी लंबे अरसे के लिए वो इस जिंदगी में है।
जबकि सच्चाई यहीं हैं कि वो आज है कल नहीं होगा। शेष होगा सिर्फ इतना कि वो अपने लिए क्या कुछ कर पाया। जहां अफसोस के अलावा कुछ न होगा।
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