जीत किसी की वो हो। वो काबिलय तारीफ होती है। उसे पाने के लिए लोगों का अपना अपना संघर्ष होता है।
किन्तु जब बात एक लड़की की जीत आए। वो भी खेल के मैदान से। तब तारीफ करना चाहिए।
इस बीच हम सब को ये ध्यान रखना चाहिए कि हम उस देश से है जहां खेल के मैदान पर आने से पहले अनेक तरह की परेशानी का सामना करना पड़ता है।
जहां उसे सामाजिक, आर्थिक रूप से अनेक तरह की परेशानी का सामना करना पड़ता है इस सब के बाद उस लड़की का सामना खेल के मैदान से होता है।
जहां उसके जीतने में सहायता भले किसी ने न की हो। किन्तु
उसके हारने पर गलियां देने पूरा देश आ जाता है।
इस बीच महान अनुभवी लोगों का प्रसिद्ध डॉयलॉग शुरू हो जाता है कि लड़की भला क्या ही करेगी। अरे इन्हें खेलना भी आता है।
ऐसी सोच रखने वाली हर मानसिकता पर मनु भाकर की जीत एक तमाचा है। जो लड़की को एक वस्तु के अलावा कुछ नहीं समझते हैं। जो उनकी इच्छा के अनुरूप करें तो ठीक है वरना वो गलत ही हो जाती है।

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